जात-पात से परे भक्ति: जब भगवान ने भक्त के सम्मान में मंदिर के कपाट बंद कर दिए
परिचय
भक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है? क्या भक्ति जाति, धर्म और ऊँच-नीच के बंधनों में बँधती है? या फिर भक्ति वह शक्ति है जो भगवान को भी भक्त के समक्ष नतमस्तक कर सकती है? इतिहास साक्षी है कि जब भी किसी भक्त ने निष्कलंक प्रेम और समर्पण के साथ भगवान की आराधना की, तो स्वयं भगवान ने सभी सामाजिक बंधनों को तोड़कर अपने भक्त के साथ खड़े होने का निर्णय लिया। चोखो मेला की कथा भी इसी तथ्य को प्रमाणित करती है। यह कथा न केवल भक्ति की सच्ची परिभाषा को स्पष्ट करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि भगवान केवल प्रेम के भूखे होते हैं, न कि जाति, धर्म या बाहरी आडंबर के।
चोखो मेला का दिव्य जन्म
चोखो मेला का जन्म किसी सामान्य संतान की भाँति नहीं हुआ था। वे किसी गर्भ से उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि भगवान की कृपा और भक्ति के अद्भुत मिलन से प्रकट हुए।
भक्त दंपति की नित्य साधना
एक ब्राह्मण दंपति, जो अत्यंत धार्मिक और भगवान पंढरीनाथ के अनन्य भक्त थे, प्रतिदिन पंढरपुर जाकर भगवान के दर्शन करते और श्रद्धा से उनकी सेवा में अर्पण करते। वे पूर्णतः भक्ति में लीन रहते थे और उनकी दिनचर्या का सबसे महत्वपूर्ण भाग भगवान का पूजन और उनकी प्रसन्नता के लिए अर्पण करना था।
एक दिन, ब्राह्मण के मन में विचार आया—“हम नित्य भगवान के दर्शन करते हैं, परंतु क्या ही अच्छा हो यदि हम उनके लिए कुछ विशेष भोग ले जाएँ!”
यह सोचकर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, “आज हम भगवान को ताजे और मीठे आमों का भोग अर्पित करेंगे।”
ब्राह्मण दंपति ने बाजार से सबसे अच्छे, रसीले और सुवासित आम खरीदे और उन्हें साफ करके एक टोकरी में रख लिया। उनके हृदय में भगवान के प्रति अनन्य प्रेम उमड़ रहा था, और वे पूर्ण श्रद्धा से पंढरपुर के मंदिर की ओर चल पड़े।
भगवान की लीला: ब्राह्मण रूप में भिक्षा माँगना
भगवान अपने भक्तों की भक्ति को परीक्षा में डालते हैं, परंतु जब भक्त का प्रेम निष्कलंक होता है, तो वे स्वयं उसे देखने को व्याकुल हो उठते हैं। जैसे ही ब्राह्मण दंपति पंढरपुर मंदिर के निकट पहुँचे, भगवान से प्रतीक्षा नहीं हुई। वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके मंदिर के बाहर आ गए और भक्त दंपति के मार्ग में खड़े हो गए।
उनका स्वर अत्यंत कोमल था, लेकिन स्वर में एक आर्त पुकार थी। उन्होंने ब्राह्मण से कहा—
“हे दयालुजन! हम कई दिनों से भूखे हैं, कृपया हमें कुछ आम खाने के लिए दें।”
ब्राह्मण और उनकी पत्नी एक क्षण के लिए रुके और फिर सोचने लगे, “ये ब्राह्मण भूखे हैं, और हमारे पास बहुत सारे आम हैं, तो क्यों न इन्हें कुछ दे दिए जाएँ?”
ब्राह्मणी ने प्रेमपूर्वक दो-तीन आम वृद्ध ब्राह्मण बने भगवान को दे दिए।
भगवान का प्रेममयी खेल
भगवान प्रेम में इतने सराबोर थे कि वे आम लेकर तुरंत वहीं बैठ गए और खाने लगे। लेकिन उनकी लीला कुछ और ही थी!
वे पूरा आम नहीं खाते थे, बल्कि आम को हल्का-हल्का चूसते और फिर ब्राह्मणी की गोद में डाल देते।
ब्राह्मण और ब्राह्मणी चकित होकर यह दृश्य देख रहे थे—“यह साधु कैसा व्यवहार कर रहा है?”
वे आपस में विचार करने लगे,
“कोई भूखा व्यक्ति भोजन को इस प्रकार खाकर छोड़ता नहीं है, और फिर इसे हमारी गोद में क्यों डाल रहा है?”
परंतु वे भगवान की लीला को समझ नहीं सके और सोचा कि जो आम बच गए हैं, वे किसी अन्य भूखे को दे देंगे। और वे आगे बढ़ गए |
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बालक चोखो मेला का प्रकट होना
ब्राह्मणी ने जब अपनी झोली की ओर देखा, तो वह अत्यंत भारी हो चुकी थी। उन्हें लगा कि शायद आम का भार बढ़ गया है, परंतु जब उन्होंने झोली खोली, तो उनके नेत्र विस्मय से फैल गए!
उनकी झोली में कोई आम नहीं था, बल्कि एक नन्हा, दिव्य ज्योति से प्रकाशमान बालक लेटा हुआ था!
बालक के मुख पर दिव्य आभा थी, उसका रूप अद्वितीय था और उसकी आँखों में ऐसी चमक थी, मानो साक्षात भगवान स्वयं प्रकट हो गए हों।
ब्राह्मणी हतप्रभ रह गई। उसके मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे। उसने अपने पति को पुकारा, “सुनिए, देखिए यह क्या हुआ!”
ब्राह्मण ने जब यह देखा, तो वे भी स्तब्ध रह गए।
“यह बालक कहाँ से आया? अभी तो हमारी झोली में केवल आम थे!”
बालक का नाम पड़ा ‘चोखो मेला’
ब्राह्मणी को समझ नहीं आ रहा था कि यह बालक कहाँ से आया। उन्होंने भयभीत होकर विचार किया,
“यदि मैं इस बालक को घर ले जाऊँगी, तो लोग मुझसे पूछेंगे कि यह कहाँ से आया? मैं क्या उत्तर दूँगी?”
इस भय से उन्होंने उस बालक को एक सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया और आगे बढ़ गईं।
थोड़ी देर बाद वहाँ से कुछ चर्मकार (मोची समाज के लोग) निकले। उन्होंने रोते हुए बालक को देखा और भगवत-प्रसाद मानकर उसे अपने साथ ले गए।
इस प्रकार, चोखो मेला का पालन-पोषण एक चर्मकार परिवार में हुआ।
जिस प्रकार भगवान ने भक्त दंपति को आम चोखकर (चूसकर) दिए थे और उसी से बालक प्रकट हुआ था, उसी के कारण इस बालक का नाम पड़ा—चोखो मेला!
चोखो मेला की भक्ति और मंदिर में प्रवेश का प्रयास
जैसे-जैसे चोखो मेला बड़े हुए, उनके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति की भावना और गहरी होती गई।
वे अपने पिता के साथ खेतों में काम करते थे। एक दिन, उन्होंने अपने खेतों में सुंदर केले उगते देखे।
उनके मन में विचार आया,
“क्यों न मैं यह केले भगवान पंढरीनाथ को भोग लगाने ले जाऊँ?”
उन्होंने बढ़िया केले चुने, उन्हें एक झोले में बांधा और 12 किलोमीटर की यात्रा कर पंढरपुर के मंदिर पहुँचे।
जैसे ही वे मंदिर के अंदर प्रवेश करने लगे, पुजारियों ने उन्हें रोक लिया।
जाति के कारण भक्ति पर रोक
पुजारियों ने कहा,
“तू चर्मकार है, तेरा मंदिर में क्या काम?”
लेकिन चोखो मेला भगवान के प्रेम में इतने लीन थे कि उन्होंने इस रोक को अनदेखा कर दिया और आगे बढ़ गए।
पुजारियों ने उन्हें घेर लिया और बुरी तरह से पीटा। उनके कपड़े फाड़ दिए, सिर और शरीर पर घाव कर दिए और खून से लथपथ उन्हें मंदिर से बाहर फेंक दिया।
भगवान पंढरीनाथ का भक्त के प्रति प्रेम
शाम को चोखो मेला अपने घावों को साफ कर रहे थे और भगवान से नाराज होकर बोले,
“हे प्रभु! मैं आपके लिए भोग लाया था, मैंने कुछ माँगा नहीं था, फिर भी मुझे इतना मारा गया।”
इतने में ही भगवान श्रीकृष्ण पीतांबरी धारण किए स्वयं प्रकट हो गए।
भगवान ने प्रेमपूर्वक चोखो मेला के कंधे पर हाथ रखा और कहा,
“ए चोखा! तू उदास क्यों है?”
चोखो मेला ने कहा,
“प्रभु! आपने वहाँ मुझे क्यों नहीं बचाया?”
भगवान मुस्कुराए और बोले,
“जो मुझे मूर्ति समझते हैं, उनके लिए मैं मूर्ति ही रहता हूँ। लेकिन तू मुझे साक्षात भगवान मानता है, इसलिए मैं तेरे सामने प्रकट हुआ हूँ।”
भगवान ने उनके हाथ से केले खाए और बाकी केले अपनी पीतांबरी में बाँध लिए।
चोखो मेला ने पूछा,
“प्रभु! आप केले बाँधकर क्यों ले जा रहे हैं?”
भगवान बोले,
“रुक्मिणी जी भी भूखी हैं, मैं उनके लिए ले जा रहा हूँ।” ( इसे भी पढे- मां शाकंभरी देवी की परम आनंदमयी कथा )
भगवान का मंदिर के द्वार बंद कर लेना
अगली सुबह जब मंदिर के कपाट खुले, तो पुजारियों ने देखा कि भगवान के चारों ओर केले के छिलके पड़े हैं।
पुजारियों ने क्रोधित होकर फिर से चोखो मेला को मारा।
भगवान को यह सहन नहीं हुआ और उन्होंने मंदिर के सभी द्वार अंदर से बंद कर लिए।
भगवान ने पुजारियों से कहा,
“जब तक तुम चोखो मेला को सम्मानपूर्वक मंदिर नहीं लाओगे, तब तक यह मंदिर बंद रहेगा।”
चोखो मेला का सम्मान और मंदिर के द्वार खुलना
पुजारियों को अपनी गलती का एहसास हुआ।
उन्होंने एक दिव्य पालकी सजाई, चोखो मेला को उसमें बैठाया और पूरे नगर में सम्मानपूर्वक घुमाया।
जैसे ही पालकी मंदिर पहुँची, मंदिर के द्वार अपने आप खुल गए।
भगवान ने चोखो मेला को प्रणाम किया और कहा,
“आज मैं भक्त का दर्शन कर रहा हूँ!”
निष्कर्ष
चोखो मेला की भक्ति हमें सिखाती है कि भगवान जात-पात नहीं देखते, वे केवल प्रेम और समर्पण को स्वीकार करते हैं।
भक्त के प्रेम के आगे भगवान स्वयं झुक जाते हैं और उसके सम्मान की रक्षा करते हैं।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
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चोखो मेला कौन थे?
- वे भगवान पंढरीनाथ के अनन्य भक्त थे, जिनका जन्म दिव्य रूप से हुआ और समाज ने उन्हें जाति के आधार पर मंदिर से दूर रखा।
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भगवान ने चोखो मेला के सम्मान के लिए मंदिर के द्वार क्यों बंद कर दिए?
- क्योंकि पुजारियों ने चोखो मेला का अपमान किया था और भगवान अपने भक्त के अपमान को सहन नहीं कर सकते थे।
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चोखो मेला की भक्ति से हमें क्या सीख मिलती है?
- यह कथा सिखाती है कि भक्ति में केवल प्रेम और समर्पण आवश्यक है, न कि जाति या सामाजिक प्रतिष्ठा।
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भगवान ने पुजारियों को क्या दंड दिया?
- उन्होंने तब तक मंदिर के द्वार नहीं खोले जब तक पुजारियों ने चोखो मेला का सम्मान नहीं किया।
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क्या आज भी चोखो मेला की पूजा होती है?
- हाँ, आज भी पंढरपुर में उनकी भक्ति को याद किया जाता है।