एक बार की बात है कबीरदास जी दिन के 12:00 बजे के करीब अपने आंगन में बैठे काम कर रहे थे।  

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तभी एक युवक उठकर कबीर दास जी के पास आया और बोला हे गुरुवर मुझे आपसे कुछ पूछना है। कबीर जी बोले हां पूछी। 

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युवक ने कबीर दास जी से पूछा विवाह करना उचित है या नहीं? प्रसंग सुनकर कबीरदास जी कुछ देर चुप रहे।  

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फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज दी और उनसे कहा जनाब लालटेन जलाकर लाओ।   तो पत्नी लालटेन जलाकर ले आई। 

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युवक यह देखकर हैरान रह गया कि इतनी धूप में लालटेन की क्या जरूरत है। युवक कबीरदास जी से बोला महात्मा जी, आप तो अजूबा हैं।  

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आपकी पत्नी भी खूब हैं। अरे धूप में बैठे हो और यहां पर लालटेन की क्या जरूरत है?  

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तो कबीर बोले बस यही तुम्हारे सवाल का जवाब है। कि यदि पति पत्नी में समर्पण हो। तर्क न हो तो ही विवाह करना उचित है।  

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कबीरदास जी के कहने का भाव है कि पति-पत्नी एक दूसरे को पूर्ण रूप से समर्पण कर दें और बिना कुछ कहे एक दूसरे का कहना माने। 

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कबीर दास जी की पत्नी ने अपने आप को कबीरदास जी के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण कर रखा था। 

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उन दोनों के बीच में किसी भी तरह का कोई तर्क वितर्क नहीं था।  इसलिए उन्होंने अपनी ही पत्नी का उदाहरण देके समझाया उस युवक को |

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