जन्म से ही वैराग्य का भाव | वैराग्यवती की अद्भुत कथा
एक राजा की पुत्री थी, उसका नाम था वैराग्यवती। उसका यह नाम इसलिए था क्योंकि जन्म के बाद जब से उसने बोलना शुरू किया, वह केवल वैराग्य की ही बातें करती थी। दुनिया के लोग कहते कि “देखो लाली, यह खिलौना कितना अच्छा है।” तो वह बाल्यपन में ही जवाब देती, “हमारा शरीर भी तो खिलौना है। जैसे यह खिलौना टूट जाएगा, एक दिन हम भी टूट जाएंगे। जैसे इस खिलौने में चाबी भरते हैं तो यह चलता है, हमारी भी चाबी है।” वह अपने पिता से भी कहती, “पिताजी आपकी कुछ ही वर्षों की चाबी बची है, थोड़ा भजन कर लो।” पिता यह देखकर घबरा जाते कि ढाई साल की बच्ची क्या वैराग्य की बातें करती है।
संसार की नश्वरता का ज्ञान
कोई उसे पुष्प लाकर देता और कहता, “देखो यह पुष्प कितना सुंदर है।” तो वैराग्यवती उस पुष्प को देखकर कहती, “क्या सुंदर है? थोड़ी देर रुकने दो, थोड़ी देर बाद पतझड़ जैसा हो जाएगा, सूख जाएगा, पत्ते बिखर जाएंगे। हम सब भी ऐसे ही हैं। जैसे फूल डाल पर होता है, परम सुंदर लगता है, डाल से टूटने के बाद धीरे-धीरे बिखरने लगता है। हम सब भी जब तक राम जी की सन्निधि में हैं, तब तक सुंदर लग रहे हैं, जिस दिन दूर हो जाएंगे, बिखर जाएंगे।”
उसकी इन बातों से बच्चे और रिश्तेदार उससे दूर भागते थे। एक बार परिवार में एक नव-दंपति का ब्याह हुआ। दोनों पति-पत्नी प्रणाम करने के लिए जब आए तो राजा की पुत्री वैराग्यवती से बोले, “हमारा ब्याह हुआ है, तुम भी कुछ अच्छा भाव सुना दो।” वैराग्यवती बोली, “सुन पाओगी? जा प्रियतम सो प्रीति घनेरी, सो देख डर ज हैं… जिस प्रियतम से तुम इतना प्रेम करती हो, जिससे सात फेरे लेकर आई हो, एक दिन यह पधार जाएगा। इसके मरने के बाद इसका शव जब देखोगी तो उससे भी डर लगेगा तुमको। मृत्यु के बाद यदि पति किसी पेड़ के ऊपर बैठा दिखाई भी दे दिया, तो डर के मारे उसके नीचे से नहीं जाओगी तुम, और अपने आप को प्रियतमा कह रही हो! मन पंछी उड़ ज है जा दिन… ता दिन तेरे तन तरवर के सबई पात झड़ ज हैं।” नव दंपति बिचारे यह सुनकर वहाँ से रोते हुए भागे कि यह कैसी बातें बोलती है।
महल का त्याग और गुरु की पुकार
पिता ने जब यह सब देखा तो कहा, “बहुत हो गया, तू एक काम कर बाहर कुटिया बनवा देते हैं, तू महल के बाहर रहा कर।” वैराग्यवती खुशी-खुशी बोली, “पिताजी, इससे बड़ा सुख तो कुछ है ही नहीं। मैं तो युवा अवस्था में ही महल छोड़ रही हूं, आपको तो कब का वन में चला जाना चाहिए था। वन में जाकर भजन करना चाहिए था। लेकिन आप भी प्रतीक्षा करो, कब जाओगे।”
महल के बाहर पिता ने अच्छी व्यवस्था करके कुटिया बना दी। उसमें वैराग्यवती रहती थी और अपने ठाकुर जी की सेवा करती थी। एक दिन वह अपने ठाकुर जी को शयन करा रही थी और कह रही थी, “हे नाथ! मुझे अब कुछ नहीं चाहिए। संसार के किसी विषय में मेरा मन नहीं है। मुझे केवल आप भाते हैं। लेकिन मैंने सुना है बिना गुरु की कृपा के आप नहीं मिलोगे। कृपा करके आप ही किसी गुरु को मेरे जीवन में भेज दो।”
चोर का गुरु रूप में आगमन और छल
उसी समय एक चोर गांव में चोरी करते-करते वैराग्यवती की कुटिया के पास पहुँच गया। खिड़की से उसने वैराग्यवती की बातें सुन लीं। चोर ने सोचा, “ओह! इसको गुरु की इच्छा है और हमको चेला की इच्छा है, हम ही गुरु बन जाते हैं।” वह चोर थोड़ा तिलक-चंदन लगाकर, गले में माला पहनकर संत का स्वरूप बनाकर द्वार पर पहुँच गया और आवाज लगाई, “अरे कोई है यहाँ? ब्राह्मण देव को बहुत जोर की प्यास लगी है, कोई जल पिलाएगा?”
वैराग्यवती ने देखा कि कोई संत बाहर जल मांग रहे हैं। वह तुरंत ठाकुर जी का प्रसादी जल लेकर दौड़ी और बोली, “जय हो महापुरुष, आप विराज जाइए और जलपान कीजिए।”
चोर बोला, “अरे बालिके! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं लेकिन मेरा एक नियम है। मैं अपने शिष्यों के हाथ से ही जल पीता हूं और शिष्यों के हाथ का ही बना प्रसाद पाता हूं। प्यास तो मुझे बहुत लगी है लेकिन मेरा कोई शिष्य मिल ही नहीं रहा है।”
वैराग्यवती तुरंत नेत्र बंद करके बोली, “मैं अभी ठाकुर जी से कह रही थी कि कोई गुरु भेज दो, मुझे लगता है ठाकुर जी ने ही गुरु भेजे हैं। अगर आपकी इच्छा हो तो आप मुझे दीक्षा दे दीजिए।” चोर ने कान में ठाकुर जी का नाम बोल दिया, तिलक लगा दिया और कंठी पहना दी। जलपान करने के बाद वैराग्यवती ने कहा, “गुरुदेव! मुझे राघव जी कैसे मिलेंगे?”
चोर रूपी गुरु ने कहा, “राघव जी से मिलना है? तो तुम्हारे पास जितनी संपत्ति है, ठाकुर जी के सोने के बर्तन आदि सब लेकर चलो। आश्रम में एक बहुत सुंदर उत्सव करना है, सब ले जाकर वहाँ लगा दो, राघव जी तुमको मिलेंगे।” वैराग्यवती ने गुरु के वचनों को अटल मानकर तुरंत सारा सामान इकट्ठा कर लिया। वह अपने गुरुदेव के मुख की ओर नहीं, बल्कि उनके चरणों की ओर देख रही थी कि मेरे गुरुदेव के चरण कितने कोमल हैं।
दीक्षा की झूठी परंपरा और अटूट निष्ठा
रास्ते में एक जगह पहुँचकर चोर गुरु ने कहा, “हमारी दीक्षा की एक परंपरा है। इस पेड़ के पास खड़ी हो जाओ।” उसने वैराग्यवती को रस्सी से पेड़ से बांध दिया और कहा, “यह सामान सब हम आश्रम पर रख के आते हैं। जब तक मैं लौटकर न आऊं, यहाँ से जाना नहीं। मेरे आने के बाद ही ठाकुर जी तुमको मिलेंगे।” वैराग्यवती बोली, “जो आज्ञा गुरुदेव, मैं कहीं नहीं जाऊंगी।” चोर सारा सामान लेकर वहाँ से भाग गया, क्योंकि वह जानता था कि अगर राजा की पुत्री को साथ ले गया तो उसकी पोल खुल जाएगी।
एक दिन, दो दिन, तीन दिन… करते-करते पांच दिन निकल गए। राजा को जब पता चला कि कुटिया से वैराग्यवती और सारा सामान गायब है, तो उन्होंने सेना लगा दी। सेना ने जंगल में वैराग्यवती को आंख बंद किए प्रसन्न मुद्रा में पेड़ से बंधे हुए पाया। राजा दौड़कर आए, लेकिन वैराग्यवती ने आंख खोलकर कहा, “पिताजी मेरे पास मत आना, मुझे खोलिएगा नहीं। मेरे गुरुदेव मुझे यहाँ बांध कर गए हैं, यह दीक्षा की परंपरा है। जब तक मेरे गुरुदेव नहीं आएंगे, मैं हिलूंगी नहीं यहाँ से।”
देवताओं का आगमन और नारायण के साक्षात दर्शन
राजा रोते हुए कई गुरुओं के पास गए, पर वैराग्यवती नहीं मानी। फिर नारद जी आए और वीणा बजाते हुए बोले, “देवी, मैं भक्तराज नारद हूं। तुम्हारे जो गुरु हैं, वो साक्षात चोर हैं।” वैराग्यवती ने साफ इंकार कर दिया। फिर राजा के निवेदन पर साक्षात महादेव आए और बोले, “लाली, वो जो तुम्हारे गुरु हैं, वो चोर हैं।” वैराग्यवती तब भी नहीं मानी। पार्वती जी के समझाने पर भी जब बात नहीं बनी, तो अंततः शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए साक्षात नारायण (ठाकुर जी) प्रकट हो गए।
ठाकुर जी का रूप देखकर वैराग्यवती रोने लगी और बोली, “मेरे नाथ मुझे मिल गए।”
भगवान ने कहा, “हम तुम्हारी निष्ठा से बहुत प्रसन्न हैं, लेकिन हम तुमको बताना चाहते हैं कि तुम्हारे जो गुरु हैं, वो चोर हैं, उचित गुरु नहीं हैं।”
गुरु महिमा का अद्भुत तर्क
वैराग्यवती हाथ जोड़कर बोली, “प्रभु! आज मेरे जीवन का सबसे बड़ा फल मिला कि मुझे साक्षात नारायण दिख गए, लेकिन माफ करिएगा, मेरे गुरु तो सर्वश्रेष्ठ हैं।”
“अरे! दुनिया के बड़े-बड़े मठाधीश और गुरु बैठे हैं, अपने शिष्यों को दीक्षा देते हैं। वर्षों-वर्ष निकल जाते हैं पर ठाकुर जी की झांकी नहीं दिखती। मेरे गुरु ने मुझे पेड़ से बांधा और मात्र सात दिन (एक सप्ताह) में सारे देवता मेरे सामने आकर खड़े हो गए। साक्षात आप आ गए। यह मेरे गुरु की कृपा नहीं है तो क्या है? आप उनको चोर कैसे कह सकते हो? जब तक मेरे गुरुदेव आकर मुझे नहीं खोलेंगे, मैं नहीं जाऊंगी।”
भगवान द्वारा चोर गुरु को लाना और कथा का सार
यह सुनकर भगवान ने महादेव की ओर देखा और बोले, “इसके गुरु को पकड़ कर लाते हैं।” ठाकुर जी पांच-छह गांव दूर गए, जहाँ वह चोर रात के समय डकैती डाल रहा था। पीछे से ठाकुर जी ने आवाज दी। चोर ने मुड़कर देखा तो साक्षात शंख-चक्र धारी भगवान खड़े थे! भगवान उसे पकड़ कर वैराग्यवती के पास लाए।
जब उस चोर ने वैराग्यवती की रस्सी खोली, तो वैराग्यवती ने दंडवत प्रणाम कर उसके चरण पकड़ लिए।
कथा का सार : गुरु शब्द में ही ताकत है। व्यक्ति में तो योग्यता अध्ययन, परिश्रम और तप से आ ही जाती है, लेकिन गुरु शब्द अपने आप में बहुत ब लवान है। बस उसके प्रति कोई निष्ठा बना ले, तो व्यक्ति योग्य ना भी हो, तो भी केवल ‘गुरु’ शब्द के प्रति विश्वास ही शिष्य का कल्याण कर देता है।
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